पशु तस्करी पर लगाम की तैयारी

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पिस्टल, देशी बम, दाव, हसिया, लाठी, हाई बीम टार्च आदि से लैस तस्कर जैसे ही सीमा के नजदीक पहुंचे, वहां तैनात सतर्क बीएसएफ के जवानों ने उन्हें रोका और चुनौती दी. इस पशु तस्करी में उनके भारतीय तस्कर भी बंग्लादेशी तस्करों को मदद दे रहे थे. तस्करों ने ड्यूटी पर तैनात बीएसएफ आरक्षक अनीसुर रहमान को घेरने की प्रयास किया।  तस्करों ने आरक्षक पर शक्तिशाली टार्च लाइट का प्रकाश डाला और जान से मारने के मकसद से शक्तिशाली देशी बमों से हमला भी किया.  आरक्षक अनीसुर रहमान ने कर्तव्य के प्रति दृढ़ निष्ठा दिखाते हुए वीरता के साथ के साथ तस्करों को अपने नापाक मंसूबे में कामयाब नहीं होने दिया और आत्मरक्षा में अपने  हथियार पीएजी से तस्करों की दिशा में एक राउंड फायर किया.

इसके बाद, तस्करो ने एक और देशी बम आरक्षक अनीसुर रहमान की तरफ फेका जोकि आरक्षक अनीसुर रहमान के दाहिने हाथ पर फाटा। देशी बम फाटने के फलस्वरुप आरक्षक के दाहिने हाथ में गंभीर चोट लगी. बम के कई छर्रे आरक्षक अनीसुर रहमान के फैंफडे , यकृत और पेट में घुस गए. इस बीच, आस-पास नाके में तैनात बीएसएफ के जवान आरक्षक  अनीसुर रहमान की सहायता के लिए मौके पर पहुंचे और अपने साथी को बेहोश और गंभीर रूप से घायल पाया. तस्कर अंधेरे और उँची जंगली घास की मदद लेकर पशुओं को पीछे छोड़ कर भागने में कामयाब रहे. हमले में घायल हुए अनीसुर की स्थिति काफ़ी गंभीर बनी हुई है, इतना ही नहीं उनका एक हाथ डॉक्टरों को काटना भी पड़ा है.

इस घटना से ठीक तीन दिन पहले मालदा सेक्टर में हुए ठीक इसी तरह के हमले में बीएसएफ का एक और जवान गंभीर रूप से घायल हो गया था. 

पशु तस्करी कितना गंभीर मुद्दा है?

बीएसएफ ने इस घटना को बहुत गंभीरता से लिया है और  सभी क्षेत्रीय मुख्यालय एवं बटालियनों को ऐसे तस्करों, जो जवानों पर हमला करते हैं, उनके खिलाफ आक्रामक रवैया अपनाने का निर्देश दिया है. सीमा सुरक्षा बल ने अपने काउन्टार पार्ट यानी बांग्लादेश की बीजीबी को ऐसे लोगों के खिलाफ़ सख्त कार्रवाई करने के लिए कहा है.

आंकड़ों के लिहाज़ से भी ये मुद्दा गंभीर दिखता है. साल 2014 में तस्करी करके ले जाए जा रहे करीब एक लाख दस हज़ार पशुओं को बीएसएफ ने ज़ब्त किया था. साल 2016 तक आते – आते सीमा पर ज़ब्त पशुओं की संख्या एक लाख 69 हज़ार तक पहुंच गई. हालांकि पिछले 3-4 वर्षों में इस तस्करी पर लगाम लगाने के मकसद से बल द्वारा उठाए गए कदमों का असर भी दिखा है. इस साल जून तक करीब 30 हज़ार पशु सीमा पर पकड़े गए हैं

सीमा पर बीएसएफ द्वारा ज़ब्त पशु

साल
2104-  1,09,999

2015-   1,53,602

2016-    1,68,801

2017-    1,19,299

2018-    63716

2019-    30292 (जून 2019)

जानकारों का मानना है कि जब्ती की इस संख्या से इस बात का अंदाज़ नहीं लगाया जा सकता है कि सही मायने में कितने पशुओं की तस्करी हुई. इसकी सबसे बड़ी वजह ये भी है कि कई भौगोलिक परिस्थितियों के चलते सीमा पर पूरी तरह से बाड़ लगाया नहीं जा सका है, जिसका फायदा तस्कर उठाते हैं. आप में से कई लोगों ने कुछ दिन पहले वायरल एक वीडियो भी देखा होगा, जिसमें तस्करों ने एक पशु को केले के तने से बाँधकर नदी में बहा दिया था, ताकि वो सीमा पार तस्करों के पास पहुंच जाये. हालांकि बाद में उसे बीएसएफ ने रेस्क्यू किया था. दक्षिण बंगाल में तस्करी की समस्या ज्यादा है. साल 2014 में हुई पशुओं की ज़ब्ती में से करीब 90 फीसदी बीएसएफ के दक्षिण बंगाल फ्रंटियर से हुई थी. इस साल भी कुल ज़ब्त पशु में से 50 फीसदी उसी इलाके में पकड़े गए हैं.

बीएसएफ की दूसरी चिंता तस्करी का बदलता ट्रेंड है. क्यूंकि ऐसे इलाके धीरे- धीरे कम होते जा रहे हैं, जहां सीमा खुली हुई है. ऐसे में तस्कर 25-50 के संगठित गिरोह में हथियारों के साथ आते हैं. उन्हें बीएसएफ जवानों पर घातक हमले या फिर सीमा की बाड़ काटने से भी परहेज नहीं है. पिछले कुछ वर्षों में अकेले उत्तर बंगाल फ्रंटियर में तस्करों के हमले में एक बीएसएफ जवान की मौत हुई है जबकि तीन दर्जन से अधिक जवान घायल भी हुए हैं. 

चिंताएं और भी हैं. तस्करों को पकड़ तो लिया जाता है, लेकिन लंबी कानूनी प्रक्रियाओं के चलते तस्करों को सजा नहीं मिल पाती है. अगर मिलती भी है तो वो मामूली हैं. एक और समस्या ज़ब्त पशुओं के मामले का है. बीएसएफ ज़ब्त पशुओं को कस्टम या फिर स्थानीय पुलिस को सौंप देता है, जो इसकी नीलामी करते हैं. जानकारों का कहना है कि बड़ी संख्या में पकड़े गए जानवर नीलामी के बाद फ़िर से तस्करों के पास ही पहुंच जाते हैं क्यूंकि आम लोग शायद ही इतनी बड़ी संख्या के लिए हो रही नीलामी में शिरकत करते हैं. 

जानकर ये भी कहते हैं कि पशु, तस्करी के लिए कई राज्यों से होकर गुज़रते हैं, और आखिर में सीमा पर पहुंचते हैं. ऐसे में इस पर लगाम राज्यों की मदद से ही लग सकती है. उनका मानना ये भी है कि जो जानवर एक बार सीमा पर पहुंच गया, वो पार भी जाएगा. पश्चिम बंगाल से वापिस अन्य राज्यों की तरफ जानवरों को जाते हुए शायद ही देखा गया है.

आखिर कैसे होती है तस्करी?

– बिना बाड़ वाले क्षेत्रों के जरिए घुसने की कोशिश
– पुलों के नीचे बिना बाड़ वाले क्षेत्रों से जानवरों को भेजना
– लीवर के इस्तेमाल से जानवरों को भेजना, जिसे झूला तकनीक भी कहते हैं
– फट्टा या बांस तकनीक
– बाड़ काटने के लिए विशेष तौर पर डिजाइन किए गए वायर कटर का इस्तेमाल
– कूरियर के तौर पर बच्चों और महिलाओं का ईस्तेमाल 

बांग्लादेश की भूमिका 

– बांग्लादेश पशु तस्करी को एक तरह से अपराध नहीं मानता
– पशु व्यापार बांग्लादेश की सरकार के लिए एक तरह से राजस्व का स्रोत है
– एक पशु तस्कर बांग्लादेश में प्रवेश के बाद, प्रति पशु 500 टका   कस्टम ड्यूटी देता है और तस्कर से व्यापारी बन जाता है
– बांग्लादेश से पशुओं के मांस का निर्यात होता है और ये भी देश की आय का जरिया है 
– पशुओं पर आधारित चमड़ा जैसी कई और उद्योग भी बांग्लादेश में चलते हैं

क्या है इलाज?

सीमा पर होनेवाली मौतों की संख्या घटाने के मकसद से साल 2010 से लगातार गैर घातक हथियारों का प्रयोग बढ़ाया गया है. जानकर मानते हैं कि ये भी एक बड़ी समस्या बन सकती है, क्यूंकि इससे तस्करों को उतना डर है तो सीमा सुरक्षा बल के लिए एक चुनौती है. बांग्लादेश में बीएसएफ की समकक्ष बीजीबी यानी बार्डर गार्ड्स ऑफ बांग्लादेश है. बीजीबी के रंगपुर  डिविजन के प्रमुख ब्रिगेडियर जलाल गनी कहते हैं – ये मुद्दा लोगों के भरण पोषण से जुड़ा हुआ है. जब तक उसका ईलाज नहीं होगा, समस्या सुलझाने में मदद नहीं मिलेगी.

दरअसल वो सीमा के निकट, खास तौर से बांग्लादेश में रह रहे लोगों की आर्थिक स्थिति की तरफ़ इशारा कर रहे थे तो मान ये भी रहे थे कि निकट भविष्य में इस मुद्दे का हल आसान नहीं है. उन्होंने दावा किया कि उनका बल तस्करों के खिलाफ बीएसएफ द्वारा दी गई हर जानकारी पर कदम उठाता है. हालांकि आंकड़े पूरी तरह इस बात की तस्दीक नहीं करते हैं. साल 2016 में बांग्लादेश ने तस्करी के जरिए लाए गए 5 लाख 30 हज़ार से ज्यादा पशु ज़ब्त किए थे. साल 2017 में ज़ब्त जानवरों की संख्या सिर्फ 8900 रह गई. यानी बीते साल के मुकाबले सिर्फ डेढ़ फ़ीसदी. साल 2018 में ये संख्या 5100 थी तो इस साल जून तक बीजीबी ने सिर्फ़ 2412 पशुओं को ज़ब्त किया है. जानकर मानते हैं कि बांग्लादेश की इस उदासीनता से तस्करों का हौसला बढ़ना स्वाभाविक है. 

डीडी न्यूज़ से बातचीत में बीएसएफ की उत्तर बंगाल फ्रंटियर के आईजी ने कहा कि  उनके क्षेत्र में मुख्य समस्या पशुओं के तस्करी की है. उन्होंने कहा – “बांग्लादेश में पशुओं की मांग काफी ज़्यादा है. हमारे देश में कोई ऐसा कानून नहीं है, जिससे एक राज्य से दूसरे राज्य में पशुओं की आवाजाही रोकी जा सके. इसके चलते चाहे भारत में कुछ लोग या बांग्लादेश के तस्कर पशुओं को सीमा तक ले आते हैं. काफ़ी जगह बाड़ लगी है, लेकिन वो भी उतनी प्रभावी नहीं रहती है कई बार तस्कर बिना बाड़ वाली सीमा का भी फायदा उठाते हैं. हम मुस्तैदी से अपने दायित्वों को निभाने की कोशिश कर रहे हैं.”

पिछले महीने ढाका में हुई बीएसएफ और बीजीबी की 48 वीं बैठक में भारत की तरफ इस मुद्दे को जोर- शोर से उठाया गया. भारत के लिए जहां ये एक बेहद ही सम्वेदनशील मुद्दा है, वहीं बांग्लादेश के लिए ये आबादी या अर्थतंत्र की जरूरत हो सकती है. सिर्फ़ सीमा पर सख्ती से शायद ही पूरी तरह से इस समस्या का निपटारा हो. ऐसे में दोनों देशों को इस समस्या के निदान के लिए दूरगामी रणनीति बनाने की जरूरत है.

–डीडी न्यूज संवाददाता सुधाकर दास की रिपोर्ट

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